शायरी

पता नहीं

             पता नहीं

 

तूने पूछा मेरे दिल का हाल मैंने बस कहा
पता नहीं।
नींद क्यों नहीं आती आजकल रातों में
क्यों दर्द उठता है सीने में
पता नहीं।
तुझसे लिपटकर क्यों रोने को दिल चाहता है
पता नहीं।
तन्हाई का आलम कुछ यूँ है रूह भी मेरी मुझसे जुदा है
क्यों कुछ अधूरा सा हूँ
पता नहीं।
कहना होता है बहुत कुछ पर कुछ न कह पता हूँ
तेरे इस सवाल का जवाब नहीं है मेरे पास, अब क्यों
पता नहीं।
इतनी बेइंतहां मोहब्बत तुझसे कब हुई
पता नहीं।
तेरे हर दर्द पर आंसू मेरे भी आते हैं
तेरी हर ख़ुशी पर होंठ मेरे भी मुस्कुराते है,
मुझसे तू पूछे क्यों
पता नहीं।
तेरा रूठना छोटी बातों पर तेरा मुस्कुराने
उन किए हुए वादों पर कुछ मुझे
भी अच्छा लगता है, क्यों
पता नहीं।
तेरी ख़ुशी में खुद को खुश पाता हूँ
तेरे डर से मैं भी सहम्म जाता हूँ,
क्यों इस कदर जुडी है रूह मेरी तुझसे
पता नहीं।
क्यों पलकें भीगती हैं मेरी तेरे रूठ जाने पर
क्यों मिलती है मुझे इतनी ख़ुशी तुझे मनाने पर
पता नहीं।
उन सर्द रातों में सुनसान सड़क पर
क्यों बस तेरा ही ख्याल आता है,
क्यों बस तुझसे मिलने पर मेरे दिल को
सुकून मिल जाता है
पता नहीं।
बात बात पर रूठ जाना तेरा मुझे
क्यों रुलाता है अश्क़ देख कर आंखों में
तेरे दिल मेरा भी भर आता है
क्यों इश्क़ है मुझे इतना तुझसे
पता नहीं।

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