स्वास्थ्य सुझाव

पीपल

पीपल

 

 भगवन कृष्ण ने पीपल के वृक्ष की महिमा का बखान करते हुए विशव प्रसिद्ध ग्रंथ गीता में कहा है-सब पेड़ो में उत्तम और दिव्य गुणों से सम्पन पीपल मै स्वयं हूँ | इसका अर्थ है की जितना सम्मान लोग भगवान कृष्ण को देते है उतना ही आदर उन्हें पीपल के वृक्ष को देना चाहिए | इसी भाव तथा विचार को ध्यान में रखकर गांवो में आज भी विधालय, पंचायत घर, मंदिर के प्रमाण आदि में पीपल का पेड़ लगाकर उसकी जड़ के चारो और एक गोल चबूतरे से घेर दिया जाता हे ताकि उसको कोई जानवर या कोई व्यक्ति हानि न पहुंचा सके। दूसरे, चबूतरे पर थोड़ी देर बैठकर प्राणवायु को नि:शुल्क ग्रहण किया जा सके।
इस विचार से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि विभिन्न प्रकार के वृक्षों में पीपल सर्वमान्य तथा सर्वगुण सम्पन्न है। वेदों में भी पीपल के गुणों का वर्णन अनेक स्थानों पर किया गया है। अथर्ववेद में एक स्थान पर लिखा है“यत्राश्वत्था….प्रतिबुद्धा अभूतन्’…. “अश्वत्थ व कारणं प्राणवायु….” इसका मतलब है कि पीपल का वृक्ष ज्ञानीध्यानी लोगों के लिए सब कुछ देता है…..जहां यह वृक्ष होता है वहां प्राणवायु मौजूद रहती है। यह बात सच भी मालूम पड़ती है कि आज भी साधु-संत और ज्ञानी-ध्यानी लोग पीपल के पेड़ के नीचे कुटिया बनाते तथा धूनी रमाते हैं। वे पीपल की लकड़ी जलाते हैं और रूखा-सूखा खाकर भी दी र्घजीवी होते हैं।

 

लम्बी आयु प्रदान करने वाला

 

यह बात पाश्चात्य वैज्ञानिकों के द्वारा सिद्ध हो चुकी है कि पीपल के पत्तों तथा छाल का प्रयोग करने से व्यक्ति बहुत-सी बीमारियों से बचा रह सकता है। बीमारियों से बचने का मतलब है-स्वस्थ शरीर और ऐसा शरीर ही बहुत समय तक जीवित रह सकता है। पीपल द्वारा लम्बी आयु प्रदान करने का यही रहस्य है। दूसरी रहस्य की बात यह है कि प्रकृति ने हमें हर प्रकार की नियामत दी है। यदि हम उनके मूल्य तथा गुणों को न पहचान कर लाभ उठाना नहीं चाहते तो इसमें किसका दोष है? इस दृष्टि से पीपल का बूटा-बूटा और पत्ता-पत्ता हमें नीरोग बनाता है, स्वस्थ रखता है और लम्बी आयु प्रदान करता है। पीपल के वृक्ष को लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह अपने आप उग आता है। इसके पके फलों को पक्षी खाते हैं। फिर वे बीट कर देते हैं। बीट में मौजूद बीज दीवारों की दरारों या निचली भूमि में गिरकर जम जाते हैं। इसका मतलब है कि पीपल के वृक्ष को उगाने के लिए न तो किसी विशेष प्रकार की भूमि की जरूरत होती है और न ही खादपानी की। यह सभी प्रकार की भूमि में पैदा हो जाता है।

 

पीपल की अगणित विशेषताएं

पीपल के वृक्ष की विशेषताएं निम्नांकित हैं

यह धरती और आकाश की विषैली वायु को शुद्ध करता है तथा प्राण-वायु का संचार आवश्यकतानु सार ही करता है।

दमा तथा तपेदिक (टी.बी.) के रोगियों के लिए पीपल अमृतताल के समान है। कहा जाता है कि दमा तथा तपेदिक के रोगियों के लिए पीपल के पत्तों की चाय पीनी चाहिए। पीपल की छाल को सुखा कर उसका चूर्ण शहद के साथ लेना चाहिए। जड़ को पानी में उबालकर स्नान करना चाहिए। ये गुण अन्य किसी वृक्ष में नहीं पाए जाते।

पीपल का वृक्ष सूर्य की किरणों को अपने पत्तों रूपी शरीर में जज्ब करके धरती पर छोड़ता है। ये किरणें तथा धूप, शीतलता तथा सौम्यता प्रदान करती हैं।

पीपल की छांव में बैठने से थकावट दूर होती है क्योंकि पीपल के पत्तों से छनकर नीचे आने वाली किरणों में तैलीय गुण आ जाते हैं जो बिना तेल के ही शरीर की मालिश कर देते हैं। उससे शरीर के अंग-अंग की टूटन दूर हो जाती है।

पीपल का वृक्ष दिन-रात प्रकाश देता है। दिन हो या रात पीपल के पेड़ के नीचे सघन
अंधकार कभी दिखाई नहीं देता। पत्तियों के बीच से दिन में सूर्य का और रात में
चन्द्रमा का प्रकाश छन-छनकर आता रहता है।

पीपल के पेड़ के नीचे बैठने पर पत्तों की लोरियां सुनने को मिलती हैं। शीतल, मंद-
सुगंध वायु के चलने पर कुछ पत्ते तालियां बजाते हैं तो कुछ मीठीमीठी ध्वनि
निकालते हैं, जो कानों में प्रवेश करके व्यक्ति को हल्का नशा देते हैं। इसी कारण
व्यक्ति आनंदित होकर सो जाता है। इसका मतलब है कि पीपल के वृक्ष में चिन्ता को
दूर करने की शक्ति है। इसलिए इस वृक्ष का एक नाम – ‘चिन्ता हरण’ – भी है।

पीपल के पत्ते, कोंपलें, फूल, फल, डाली, छाल,जड़-सभी अमृत-रस की वर्षा प्रदान
करते हैं। संसार में आनंद, सुख, दीर्घायु आदि के लिए अमृत की कल्पना की गई है।
उदाहरण के लिए व्यक्ति यदि पुत्र-पौत्र वाला हो जाता है तो वह अमर हो जाता है,
क्योंकि उसके नाम को याद रखने वाले उत्पन्न हो जाते हैं। यही अमरता है-यही
अमृत-पान है। ठीक इसी प्रकार पीपल की हरेक चीज व्यक्ति को बुद्धि,बल और
स्वास्थ्य प्रदान करती है-यही अमृत-रस

इस धरती पर हजारों प्रकार के पेड़-पौधे पाए जाते हैं लेकिन भोलेनाथ शिव-शंकर को
पीपल की छांव ही पसंद है। वे गांव या नगर के एकान्त में पीपल के नीचे बैठे मिल
जाएंगे। शंकर की पिण्डी पीपल के वृक्ष के नीचे स्थापित करने की प्रथा यों ही नहीं
प्रचलित है। इसके पीछे रहस्य है। पीपल रोगनाशक है, विषहर है, दीर्घायु प्रदान करने
वाला है। अत: शंकर बाबा को यह वृक्ष बहुत पसंद आया। अब यदि हम भी भोले-
बाबा की तरह शोक, रोग, व्याधि आदि से मुक्त होना चाहते हैं तो हमें पीपल की
शरण में जाना चाहिए।

पीपल में पुरूषतत्व प्रदान करने के गुण मौजूद हैं। चरक ने अपने ग्रंथ में लिखा है, –
“यदि व्यक्ति में नपुंसकता का दोष मौजूद है और वह अपनी पत्नी से सन्तान उत्पन्न
करने में असमर्थ है तो उसे शमी वृक्ष की जड़ या आसपास उगने वाला पीपल के पेड़
की जटा को औटाकर उसका क्वाथ (काढ़ा) पीना चाहिए। पीपल की जड़ तथा जटा में
पुरूषत्व प्रदान करने के गुण विद्यमान हैं।” पाश्चात्य देशों में इस तथ्य पर रिसर्च की
जा रही है।

वैसे तो सभी प्रकार की दवाओं का निर्माण जड़ी, बूटियों, फलों, पत्तों, छालों, रसों
आदि से होता है। उनके बनाने में देर लगती है। उस पर निर्मित दवा के प्रयोग करने
के बाद भी परहेज करना पड़ता है। किन्तु पीपल का वृक्ष ‘आशुतोष’ है। यह नाम
भगवान शंकर का है। ‘आशु का अर्थ है संतुष्टि और तोष का अर्थ है शीघ्र प्रदान
करना।’ जैसे भगवान शंकर लोगों की मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण कर देते हैं, वैसे ही
पीपल का वृक्ष बिना किसी लाग-लपेट के शीघ्र ही लाभ पहुंचाता है। स्त्रियों तथा पुरुषों
दोनों को पीपल के पत्तों तथा छाल का सेवन करना चाहिए। ये दोनों चीजें पुत्र प्रदान
करने वाली हैं-सूखी कोख को हरी करने वाली हैं।

पीपल की एक विशेषता यह है कि यह चर्म-विकारों को जैसे-कुष्ठ,फोड़े-फुन्सी, दाद- खाज और खुजली को नष्ट करने वाला है। वैद्य लोग पीपल की छाल घिसकर चर्म रोगों पर लगाने की राय देते हैं। कुष्ठ रोग में पीपल के पत्तों को पीसकर कुष्ठ वाले स्थान पर
लगाया जाता है तथा पत्तों का जल सेवन किया जाता है। हमारे ग्रंथों में तो यहां तक
लिखा है कि पीपल के वृक्ष के नीचे दो घंटे प्रतिदिन नियमित रूप से आसन लगाने से
हर प्रकार के त्वचा रोग से छुट कारा मिल जाता है।

यूनानी तथा भारतीय चिकित्सा प्रणाली में अनेक बातों, जड़ी-बूटियों तथा दवा बनाने
की विधियों में समानता पाई जाती है। सच तो यह है कि यूनानियों ने भारतीय
आयुर्वेदिक चिकित्सा-प्रणाली को ही परिवर्तित करके अपना लिया है। यूनानी थेरेपी
में भारतीय जड़ी-बूटियों तथा पेड़-पौधों से औषधि के तत्वों को ग्रहण किया गया है।
इस बात के प्रमाण यूनानी ग्रंथों में भी मौजूद हैं। परन्तु दुःख का विषय यह है कि हम
आज अपनी उन्नत चिकित्सा प्रणाली की तरफ से विमुख होकर पाश्चात्य प्रणाली को
अच्छा समझने लगते हैं, जबकि हम जानते हैं कि विदेशी दवाएं विपरीत प्रभाव अवश्य डालती हैं।

 

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