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शिवलिंग और देवियों पर जल क्यों चढ़ाया जाता है

 

किसी भी देवी/देवता की अर्चना के समय हम उन्हें अति आदर सहित सम्मान करते हैं।

जैसे, यदि आप अपने घर में पूजा कर रहे हों तो देवताओं का आवाहन किया जाता है।

पुराने ज़माने में जैसे अतिथि का सत्कार किया जाता था, वैसे ही आज भी, पहले उनको स्नान करवाया जाता है।
फिर तिलक लगाया जाता है, फिर संकल्प कराया जाता है, फिर खाना खिलाया जाता है, फिर मीठा खिलाया जाता है, फिर मुख की शुद्धि के लिए पूंगीफ़ल, (सुपारी) पान आदि प्रस्तुत किया जाता है।

– फिर वस्त्र भी भेंट किये जाते हैं। आज कल इतनी विस्तृत पूजा कभी कभी ही संभव हो पाती है।
इसलिए अधिकतर लोग केवल मंदिर आदि में शिवलिंग पर जल चढ़ा कर, या बाहर से ही माथा टेक कर पूजा हो गयी मानते हैं।

हालाँकि
सनातन धर्म में इस प्रकार पूजा/अर्चना का उद्देश्य केवल मनुष्य को भावनात्मक रूप से प्रभु के साथ जोड़ना मात्र ही था
इसलिए यदि आप मंदिर जाने में असमर्थ हैं, तो भी आपकी भावनाएं ही पर्याप्त हैं।

विश्वप्रसिद्ध उज्जैन के महाकाल के मंदिर में सुबह, शिवलिंग, को केवल जल ही नहीं दूध, दही, घी, शहद इत्यादि कईं द्रव्यों के पश्चात अंत में शमशान से लायी राख
से भी अभिषेक किया जाता है।

भस्मारती का अर्थ केवल ये दर्शाना है कि शिवजी प्रलय/ मृत्यु/विनाश के देव हैं। किसी भी मंदिर में अथवा घरों में भी जिन्होंने “ठाकुर जी” की स्थापना की हुई है, वे सभी उनका सत्कार एवं सेवा इसी प्रकार करते हैं मानो वे साक्षात वहां विराजमान हों।

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