शायरी

कोन हू में?

हर हर गंगे का उदघोष हूँ में,
जीवन में मृत्यु का अवशेष हू में,

पत्थर पत्थर में जहां शिव निवासे उस अविनाशी में
जीवन प्रत्यक्ष हूँ में, अस्सी का उल्लास हूँ में,

पञ्चगंगा का नीरव घाट हूँ में,
धारा जहां विचलित चरण प्रच्छालन को वैराग्य हू में,

समाहितमर्णिका का प्रवास हूँ में,
सृष्टि का आरम्भ हूँ में, ब्रम्हांड का सूक्ष्म कणाशेष हूँ में,

मान मर्दन कर तू मानस अविवेकी,
के महाकाल औघड़ का भयंकर तंत्र तांडव हूँ में,

मुर्दनी का उल्लास हूँ में,
मैं घोर उल्लास में जीवित लाश हूँ में,

करुण क्रंदन से मचा हाहाकार,
जहां नव प्रारब्ध को विनाश __का अट्टाहास हूँ मैं,

सरस्वती का अवतार हूँ मैं,
अन्नपूर्णा का सरल दरबार हूँ मैं,

मृत्यु क्रंदन में भी जहां जीवन का
संगीत है हाँ वही अमरत्व
का स्वाँस भरते “बनारस ” का सार हूँ मैं

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