शायरी

मैने इंसान बदलते देखा है

   जिंदगी में कुछ देखा हो, ना देखा हो…
मैंने लोगो को बदलते देखा हे…
जो केहता था मै ना झुकूंगा किसीके आगे
उसे मंदिर में सिर झुकाते देखा है…

 

मैंने आमिर को पैसे के लिए गरीब से लड़ते देखा है…
सच्चाई का पाठ पड़ने वालो को,
मैंने पैसो के लिए बिकते देखा है…
मैंने सच्चे यारो को पीठ में खंजर भोंकते देखा है…

 

  आसमान छूती इमारतों को मैंने धूल चाटते देखा है,
मैं ने एक अकेली माँ लो अपने बच्चे के लिए लड़ते देखा है
बचपन के आसिको को नफरत करते देखा है
मैंने जलन के मारे भाईओ को आपस में लड़ते देखा है…

 

            हर बात पे लड़ने वालो को,
अपने प्यार की हां में हां मिलते देखा है…
दिन रात पूजा करने वालो को मैंने अपनी माँ से लड़ते देखा है…
मैंने आदर्श की मिशाल को पिता पे हाथ उठाते देखा है…

 

            मैंने चाँद से कोमल चेहरे को
पैसो के लिए आशीष बदलते देखा है
मैने जीते जी मनुष्य को अंदर से खोखला होते देखा है…
मैंने कुछ देखा हो, ना देखा हो…
मैंने इंसान बदलते देखा हे…

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